भारतीय नौसेना अब समुद्र में केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए नहीं, बल्कि पूर्ण वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक नए युग की दहलीज पर खड़ी है।
भारत के दूसरे स्वदेशी विमानवाहक पोत (IAC-2) को लेकर रक्षा गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
उम्मीद है कि 2026 तक इस महाकाय पोत के निर्माण को औपचारिक मंजूरी मिल जाएगी। यह केवल एक जहाज नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की अजेय शक्ति का आधुनिक प्रतीक होगा।
परंपरा और आधुनिकता का संगम: एक 'हाइब्रिड' रणनीति
नौसेना अब केवल बड़े जहाजों के मोह में न फंसकर, 'ऑपरेशनल प्रैगमैटिज्म' यानी व्यावहारिक रणनीति पर ध्यान दे रही है। चर्चा अब इस बात पर नहीं है कि जहाज 65,000 टन का होगा या छोटा, बल्कि चर्चा इस पर है कि यह कितना घातक और आधुनिक होगा।
भारतीय नौसेना अब 'डिस्ट्रीब्यूटेड लेथैलिटी' (बिखरी हुई मारक क्षमता) की नीति अपना रही है, जिसका अर्थ है कि दुश्मन पर एक ही जगह से नहीं, बल्कि कई दिशाओं से और कई प्रकार के हथियारों से हमला किया जा सके।
ड्रोन तकनीक: भविष्य का युद्धक कौशल
आगामी IAC-2 की सबसे बड़ी विशेषता इसका यूएवी (UAV) इंटीग्रेशन होगा।
यह पोत केवल लड़ाकू विमानों को उड़ाने वाला मंच नहीं, बल्कि एक 'मदर शिप' (जननी पोत) की भूमिका निभाएगा।
शक्ति और सामर्थ्य का संतुलन
रणनीतिक रूप से 65,000 टन का सुपर-कैरियर हमेशा से आकर्षक रहा है क्योंकि यह अधिक लड़ाकू विमान ले जाने और लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता देता है।
लेकिन भारत ने बुद्धिमत्ता दिखाते हुए 45,000 टन के 'विक्रांत' श्रेणी के उन्नत मॉडल को प्राथमिकता देने के संकेत दिए हैं।
इस निर्णय के पीछे के मुख्य कारण:
भारत की रक्षा जरूरतों को देखते हुए नौसेना का लक्ष्य 2030 के दशक के मध्य तक 'तीन विमानवाहक पोत' की क्षमता हासिल करना है। इससे एक पोत पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी), दूसरा पश्चिमी तट (अरब सागर) पर तैनात रहेगा, जबकि तीसरा मरम्मत या रखरखाव (Maintenance) के दौरान भी सुरक्षा चक्र को टूटने नहीं देगा।
भारत का यह कदम स्पष्ट संदेश है कि हम अपनी रक्षा के लिए किसी और पर निर्भर नहीं हैं। IAC-2 के माध्यम से भारतीय नौसेना 'डेटा डोमिनेंस' और नेटवर्क-आधारित युद्ध प्रणाली की ओर बढ़ रही है, जहाँ एक विमानवाहक पोत समंदर के सीने पर चलता-फिरता एक अभेद्य किला होगा।
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